Monday, 10 December 2012

"....लबे तब्बसुम से धवल चाँदनी गाने लगे हो "

"चाँद पे तुम महरबाँ नज़र आने लगे हो
इतने कि ख़ुद ही चाँद नज़र आने लगे हो "
"रोशन है तेरे ज़माल से मेरे दोनों जहान
लबे तब्बसुम से धवल चाँदनी गाने लगे हो "
"फिर हुई जा रही है सहर मेरे ख़्वाबों की
फिर तन्हा करके मुझे तुम जाने लगे हो "
* नरेन *

"....इश्क़ में तेरे बदनाम मिले"

"तेरी तलाश में लोग तमाम मिले
तू ना मिला कई तेरे हमनाम मिले"
"रिंद-ओ-नासेह रहबर-ओ -रहनुमां
जो मिले है इश्क़ में तेरे बदनाम मिले"
"मेरी मंज़िल है या तेरा दयार है
जिधर भी देखिए तेरे गुमनाम मिले"
----' नरेन '


Sunday, 18 November 2012

रियासत-ए-इश्क़ अपने नाम......




तकदीर में नहीं तू ,जिसमे हो तू शामिल
कुछ ऐसा अपना नसीब लिख दूँ तो चलूँ
खुदा की इबादत में तेरा नाम
ऐ मेरे हबीब लिख दूँ तो चलूँ
मेरा दिल ही ना हुआ मेरा , दुआएं तमाम
क्या करूँ ,नाम-ए-रकीब लिख दूँ तो चलूँ
रियासत-ए-इश्क़ अपने नाम
एक-दो ज़रीब लिख दूँ तो चलूँ    ---नरेन 

रात रात भर......

" दिया कीजिएगा सदाएँ रात रात भर ।
 लिया कीजिएगा बलाएँ रात रात भर ।।
 फ़र्क नहीं इश्क़ेबुताँ-ओ-इबादतेख़ुदा मेँ ।।।
 किया कीजिएगा दुआएँ रात रात भर "।।।।
                       ¤नरेन¤

प्रेम की बिसात पर...


 प्रेम की बिसात पर...
फ़क़त एक जीत की उम्मीद में
मैं चलता गया हर एक चाल 'अँधी '
कि हल्के 'पत्ते ' देख छोड़ दोगे तुम एक बाजी मेरे लिए
हर बार तुमने पत्ते दिखाने को कहा मगर
हर बार मुझे पत्ते फेंकने पड़े बिना देखे
तुम्हारी जीत के लिए

 प्रेम की बिसात पर ..... " नरेन "

Sunday, 22 July 2012

बस . ..यूँ ..... ही ....!!!!!

Monday, 26 March 2012

बिखरे से अश'आर

तेरी तलाश में लोग तमाम मिले ,
तू ही ना मिला तेरे हमनाम मिले  !
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मेरी जानिब वो कदम बढ़ाए है तो चले है साँसें '
रुके है कदम तो जान सीने से निकल जाए है  !
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" शर्मिन्दा हूँ कि वो  खफा है  '
क्यूँ जिंदा हूँ कि वो खफा है !
माजरा समझ में आता ही नहीं '
किसलिए खफा है क्यूँ खफा है !
मुझी को अब कहलाना  था बेवफा '
वो जनता ही नहीं क्या ज़फा है  !"
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 -------नरेन -----

Wednesday, 7 March 2012

कि दिल बहल जाए...







 कि दिल बहल जाए...

तकदीर के सितम से जिस्मेहयात छलनी है ,
 पास आओ कि सीने के जख़्म सहल जाए ।
मय , मीना , साक़ी , साज-ए-तरन्नुम ,
बहुत किए जतन कि दिल बहल जाए ।
ये रात , ये सर्द हवा ,ये तन्हाई , ये जुदाई ,
 कँधे चार हो गये बस दम निकल जाए l

                                  ---नरैन

Saturday, 3 March 2012

छुपाये 'नाम'


सोचता हूँ कुछ लिखूं
आज
मैं क्या क्या लिखूं ....

लड़कपन
के
मासूम
ख़याल को ,
स्कूल
के कच्चे रास्ते में
इंतजार
को ,
कॉपियों
के आखरी पन्नों में लिखी,
टेढ़ी
-मेढ़ी पंक्तियों में छुपाये 'नाम' को ,

सोचता
हूँ कुछ लिखूं
आज
मैं क्या क्या लिखूं ....

आया
नहीं बताना, ही आया पाना ,
हाथो
की
सुर्ख
मेंहदी के निशानों को,
लहुलुहान
अरमानों को ,
तेरे
जाने को, मेरे खो जाने को ,

सोचता
हूँ कुछ लिखूं
आज
मैं क्या क्या लिखूं
---नरैन

मजलूम की बददुआ


मुद्दतों पीया किये , किश्तों में जिया किये ,
अब
जो की है तौबा,मरना भी मुहाल हुआ !
मय
तू , ना तेरा गम, कोई आरजू ,
ज़िन्दगी
है या किसी मजलूम की बददुआ !
                                 ---'नरेन'

मासूम ख़्वाब……



तेरे हाथों में सजे मेंहदी ,मेरे सर पे सेहरा ...,
मेरे
मासूम ख़्वाब पे है, ज़माने का सख्त पेहरा !
पाकीज़गी
--मुहब्बत का अब ये आलम है ,
मुझे
महबूब में नज़र आता है ख़ुदा का चेहरा !!
                             ---'नरेन '

Friday, 2 March 2012



 
"ग़म  की  बारिश  ही  सही ,इनकार  कुछ   लाया  तो  है ,
बहुत  है  मेरे  लिए  के  आपने  बुलाया  तो  है !".
 " रोशन दुनिया नहीं मुझे तारीकी अज़ीज़ है ,
मेरे भ्रम की दुनिया में तेरा साया तो है  ! "
लरजते  लब,झुकती निगाह ,बे-लय धड़कन ,
चुपके से  दिल में  कोई समाया तो है !
छलकते पैमाने , खनकती मीनाएं ,मदहोश निगाह --साकी ,
तश्नगी - -जीश्त लिए मैखाने में कोई आया तो है ...!
टूटे हैं ना झुके हैं , ना मरे हैं , ज़िंदा हैं !
ज़िंदगी तूने खूब आजमाया तो है !!

Tuesday, 14 February 2012

पानी -पानी !!!


पानी -पानी !!!
सीने पे ज़ख्म लिए तडपी है , रोई है ज़मीं हाय !" पानी -पानी" ,
कहीं सैलाबों ने किया है ज़मीं पै ज़िंदगानी को पानी पानी !!!
साकी ने सरे बज़्म नज़र उठा के जरा झुका ली है  ,
शराब शराब हुआ पैमानों में कतरा- कतरा, पानी- पानी !!!
ये आज किस ने  मेरा मुझ से ही तआरुफ़ करा दिया है  'नरैन'
मौ  मौ हुआ है मेरी आँखों का , ठहरा - ठहरा पानी -पानी !!!
                                                       ----- 'नरैन'

तआरुफ़--- introduction

Tuesday, 10 January 2012

आग़ाज़

कुछ बेतरतीब ख़याल हैं और कुछ नासमझी के वाकयों से ज़िन्दगी के हिस्से में आये हुए तज़ुर्बे हैं. कुछ हसरतों की कतरने हैं, कुछ ज़री वाले ख़्वाब है. जब भी कोई उदास शाम का सिरा खिल उठेगा, मैं उसे अपने लफ़्ज़ों में बांध कर यहाँ टांग दिया करूँगा.

सारा इलज़ाम मेरी शराबखोरी पे क्यों है
तेरी उल्फत में भी कदम मेरा डगमगाया तो है

चिता की लकड़ियाँ क्या जलाएगी मेरे बेजान जिस्म को
उल्फत की आग ने रूह को मेरी ज़िन्दगी भर झुलसाया तो है


भाई की नम आँख देख कर गला मेरा भी भर आया
रंग लहू ने अपना कुछ दिखाया तो है



[पेंटिंग की तस्वीर पिकासो अंकल से बिना इजाज़त इस उम्मीद में ले ली गयी है एक दिन मेरे लफ़्ज़ों में भी ऐसे ही रंग उतर आयेंगे.]