कुछ बेतरतीब ख़याल हैं और कुछ नासमझी के वाकयों से ज़िन्दगी के हिस्से में आये हुए तज़ुर्बे हैं. कुछ हसरतों की कतरने हैं, कुछ ज़री वाले ख़्वाब है. जब भी कोई उदास शाम का सिरा खिल उठेगा, मैं उसे अपने लफ़्ज़ों में बांध कर यहाँ टांग दिया करूँगा.
सारा इलज़ाम मेरी शराबखोरी पे क्यों है
तेरी उल्फत में भी कदम मेरा डगमगाया तो है
चिता की लकड़ियाँ क्या जलाएगी मेरे बेजान जिस्म को
उल्फत की आग ने रूह को मेरी ज़िन्दगी भर झुलसाया तो है
भाई की नम आँख देख कर गला मेरा भी भर आया
रंग लहू ने अपना कुछ दिखाया तो है
[पेंटिंग की तस्वीर पिकासो अंकल से बिना इजाज़त इस उम्मीद में ले ली गयी है एक दिन मेरे लफ़्ज़ों में भी ऐसे ही रंग उतर आयेंगे.]
सारा इलज़ाम मेरी शराबखोरी पे क्यों है
तेरी उल्फत में भी कदम मेरा डगमगाया तो है
चिता की लकड़ियाँ क्या जलाएगी मेरे बेजान जिस्म को
उल्फत की आग ने रूह को मेरी ज़िन्दगी भर झुलसाया तो है
भाई की नम आँख देख कर गला मेरा भी भर आया
रंग लहू ने अपना कुछ दिखाया तो है
[पेंटिंग की तस्वीर पिकासो अंकल से बिना इजाज़त इस उम्मीद में ले ली गयी है एक दिन मेरे लफ़्ज़ों में भी ऐसे ही रंग उतर आयेंगे.]
