"तेरी यादों की रहगुज़र में दामन आज तर है , यूँ नहीं हुई है हवाएँ , कभी नम चलते-चलते " "वक़्त के गलियारों की रफ़्तार में कहीं खोये रहे, कभी राहें रफ़्ता-रफ़्ता , कभी हम चलते-चलते "
Hathkadh । हथकढ़: हम जाने क्या क्या भूल गए: आज सुबह से इतिहास की एक किताब खोज रहा था। किताब नहीं मिली। इस किताब में यात्री के द्वारा लिखे गए ब्योरों में उस काल का इतिहास दर्ज़ था। पि...