डॉ. नरैन का कोना
Wednesday, 15 May 2013
"तेरी यादों की रहगुज़र में दामन आज तर है ,
यूँ नहीं हुई है हवाएँ , कभी नम चलते-चलते
"
"वक़्त के गलियारों की रफ़्तार में कहीं खोये रहे,
कभी राहें रफ़्ता-रफ़्ता , कभी हम चलते-चलते "
1 comment:
Anonymous
25 June 2013 at 09:06
Baah Baah kya baat hai.
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Baah Baah kya baat hai.
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